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Why wear Handloom? क्यों पहनें हथकरघा

Why wear Handloom? क्यों पहनें हथकरघा

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In the year 2015, 7th August was declared the 'National Handloom Day' by the government of India. Subsequently, in 2016, the hashtag 'I wear Handloom' was launched. Several designers and celebrities also participated in this campaign and used the hashtag in their social media posts. Several saree-groups that promoted handloom were existing on Facebook but the growth in the popularity of Instagram, around 2015-2016, took this campaign to a level where it reached even the non-saree wearers. The '100 saree pact' also gained more popularity in these very years and led to simple handloom sarees being considered for everyday wear, by women from different walks of life. Coincidentally, this was also the time when several fashion bloggers and influencers emerged on Instagram, whose accounts focused on sarees, particularly the handloom ones. All these events occurred almost sequentially and brought handloom into the spotlight.

India has an unparalleled tradition of handloom weaving, that keeps not just traditional arts but also families of weavers alive. Presumably, supporting handloom is and can only be a good thing but there is a point of view that considers the culture of wearing handloom as 'elitist'. This can make one question the reasons for wearing and promoting handloom. Why must we wear handloom textiles? Just because it is in trend? It is being considered 'cool' to have a handloom collection? or because it is a sustainable choice?

Here are four reasons to wear handloom :

  1. Preservation of Heritage: Handlooms in India produce some of the oldest and exquisite heritage weaves in a plethora of designs. These weaves truly reflect the cultural diversity of the country. Each state has its signature weave(s) steeped in the region's history and aesthetics. It would not be an exaggeration to say that handloom weaving is not merely a craft but an art-form in India.
  2. A Greener choice: Handloom weaving is one of the greenest ways of making textiles. They don't require the kind of resources required to run large mills. Handloom's mechanized cousin Powerloom uses lesser resources compared to mills but it does require electricity which is scarce in India. Handlooms don't require electricity too.
  3. Empowering the skilled artisans: A handloom weaver can choose to work independently, weavers can form groups and associations to support each other yet remain autonomous. Handlooms can work even in the remotest of villages where there is limited or no supply of electricity to support power loom units. Supporting handloom can mean employment for people even in those places.
  4. Each piece is unique: Every handloom saree is 'one-of-a-kind' even if that design is repeated in a hundred other sarees. Two handmade pieces can never be the same. The human touch adds warmth and life to each piece that machine-made pieces can't really replicate.

Strangely, whenever Handloom is mentioned most people tend to imagine Khadi-like coarse fabrics. The stereotype that only professors, journalists, social workers, and politicians wear 'handloom' has still not been shattered. Handlooms also produce the most luxurious and resplendent textiles like the royal Benarasi brocades, rich Kanjeevarams, and gossamer ethereal Chanderis, There's a handloom textile/saree for every occasion and season, one just needs to pick the right one.

वर्ष 2015 में, भारत सरकार ने 7 अगस्त को 'राष्ट्रीय हथकरघा दिवस' घोषित किया । इसके बाद, 2016 में, हैशटैग 'आई वियर हैंडलूम' लॉन्च किया गया। कई डिज़ाइनरों और मशहूर हस्तियों ने भी इस अभियान में हिस्सा लिया और अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस हैशटैग का इस्तेमाल किया। फ़ेसबुक पर पहले से कई साड़ी-समूह मौजूद थे, जो हथकरघा को बढ़ावा दे रहे थे, लेकिन साल 2015-2016 में इंस्टाग्राम की लोकप्रियता बढ़ने की वजह से ये अभियान उन लोगों तक भी पहुँच गया जो लोग साड़ी नहीं पहनते। इसी समय '100 साड़ी पैक्ट' ने भी लोकप्रियता हासिल की और महिलाओं को हथकरघा साड़ियाँ पहनने के लिए प्रेरित किया। संयोग से ये वो समय था जब इंस्टाग्राम पर कई फ़ैशन ब्लॉगर और इंफ्लूएंज़र उभर आए और उनके अकाउन्ट लोगो को साड़ियाँ पहनने के लिए प्रेरित करने लगे। इत्तेफ़ाक़ से ये सभी घटनाएँ एक के बाद एक घटीं और हथकरघा को 'स्पॉटलाइट' में ले आयीं।

भारत में हथकरघा बुनाई की एक अनूठी परम्परा है, जो न केवल पारम्परिक कला को ज़िन्दा रखती है बल्कि बुनकरों का रोज़गार भी चलाती है। देखा जाए तो हथकरघा को प्रोत्साहन देना केवल अच्छी बात हो सकती है लेकिन एक दृष्टिकोण है जो हथकरघा पहनने की संस्कृति को 'एलिटिज़्म' या रईसों का शौक़ मानता है। ये बात हैण्डलूम पहनने और उसे बढ़ावा देने की सोच पर प्रश्नचिन्ह लगाती है! हमें हथकरघा वस्त्र क्यों पहनना चाहिए? सिर्फ़ इसलिए कि ये चलन में है? और हैण्डलूम कलेक्शन होना अच्छा माना जा रहा है? या क्योंकि ये एक 'सस्टेनेबल' क़दम है?

हथकरघा पहनने की चार बड़ी वजह हो सकती हैं:
1.धरोहर/विरासत का संरक्षण: भारत में हथकरघा के ज़रिये कुछ बेेेहद पुराने और रिवायती कपड़े बनते हैं, ये कपड़े भारत की विविधता को दर्शाते हैं। देश का हर राज्य किसी न किसी ख़ास तरह के हथकरघा कपड़े या साड़ी के लिए मशहूर है। इन साड़ियों-कपड़ो में उस क्षेत्र की संस्कृति, वहाँ का इतिहास झलकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत में हथकरघा बुनाई सिर्फ़ 'हैण्डीक्राफ़्ट' नहीं बल्कि कला है।

  1. ग्रीन विकल्प : हथकरघा बुनाई कपड़ा बनाने के सबसे 'एको-फ़्रेंडली' तरीक़ो में से एक है। हैण्डलूम को बड़ी मिलों की तरह बड़े संसाधनों की ज़रूरत नहीं होती है। हैण्डलूम का बिजली से चलने वाला रूप पावरलूम, मिलों के मुक़ाबले, कम संसाधनों से चलता है, लेकिन बिजली के बिना वो भी नहीं चल सकता और भारत में बिजली की दशा हम सब जानते हैं। हथकरघा को बिजली की भी ज़रूरत नहीं होती।
  2. कुशल कारीगरों को सशक्त बनाना : एक हथकरघा बुनकर स्वतंत्र रूप से काम करना चुन सकता है। कई बुनकर मिलकर संघ बना सकते हैं, फिर भी आज़ादी से अपने घर से काम कर सकते हैं। हथकरघा उन दूर दराज़ गाँवों में भी लोगो को रोज़गार देने का काम कर सकता है जहाँ पावरलूम यूनिट चलाने के लिए बिजली नहीं आती।
  3. प्रत्येक साड़ी 'एक्सक्यूलसिव' होती है: हर हथकरघा साड़ी दूसरी से अलग होती है, भले ही उस डिज़ाइन की सौ साड़ियाँ बनें। क्योंकि हाथ की बनी दो चीज़ें कभी एक जैसी नहीं हो सकतीं। मानव-स्पर्श हर कपड़े में ऐसी जान डाल देता है जो मशीन कभी नहीं कर सकती।

अजीब बात है, जब भी हथकरघा की बात होती है, तो ज़्यादातर लोग खादी जैसे मोटे कपड़ों की कल्पना करते हैं। केवल प्रोफ़ेसर, पत्रकार, सामाजसेवक और राजनेता ही 'हथकरघा' पहनते हैं, ये धारणा भी अबतक पूरी तरह टूटी नहीं है। हथकरघा से शाही बनारसी किमख़्वाब, राजसिक कांजीवरम और चन्देरी जैसी शानदार साड़ियाँ भी बनती हैं। भारत में हर अवसर, मौसम और बजट के लिए एक हैण्डलूम कपड़ा / साड़ी मौजूद है, बस सही चुनाव की ज़रूरत है।

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